तेल, आटा नहीं… अब अफगानिस्तान से युद्ध, क्या पाकिस्तान पर होगा तबाही का ट्रिपल अटैक?

  नई दिल्ली

अमेरिका और ईरान में युद्ध (US-Iran War) जारी है, जिससे दुनिया में तेल संकट गहराया हुआ है और पाकिस्तान इससे पहले ही बेहाल नजर आ रहा है, दूसरी ओर पड़ोसी देश पर कर्ज (Pakistan Debt) भी लगातार बढ़ता जा रहा है. इस बीच अफगानिस्तान के साथ जंग (Pakistan-Afghanistan War) से उसे तगड़ी मार पड़ी है. एक साथ ट्रिपल अटैक ने पाकिस्तान का तेल निकाल दिया है. पहले से ही आर्थिक संकट के चलते भारी भरकम कर्ज के बोझ तले देश का ईरान युद्ध से तेल बंद हुआ, तो अफगानिस्तान से साथ जंग ने देश की महंगाई बढ़ाकर इकोनॉमी पर संकट बढ़ा दिया है।

लगातार बढ़ रहा कर्ज का बोझ 
पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट झेल रहा है और इससे उबरने के लिए वो तमाम मित्र देशों के साथ ही आए दिन आईएमएफ और विश्व बैंक के सामने कटोरा लेकर मदद मांगता नजर आता रहा है. हालांकि, भारी भरकम आर्थिक मदद मिलने के बाद भी देश के हालात बदतर ने हुए हैं. पाकिस्तानी मीडिया की एक रिपोर्ट को देखें, तो Pakistan पर जनवरी 2026 तक कुल कर्ज 79,322 अरब पाकिस्तानी रुपये तक पहुंच गया।

स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान द्वारा जारी डॉक्युमेंट्स के मुताबिक, पाकिस्तान के कर्ज में घरेलू उधार में तेज उछाल आया है. केंद्रीय बैंक (SBP)  के आंकड़ों को देखें, देश की संघीय सरकार का घरेलू कर्ज जनवरी 2026 तक 55,978 पाकिस्तानी अरब रुपये तक पहुंच गया था. इसके अलावा  बाहरी कर्ज 23,344 अरब पाकिस्तानी रुपये हो गया. जो जीडीपी का करीब 70% है और पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली का बड़ा उदाहरण है।

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यहां बता दें कि पाकिस्तान आईएमएफ का सबसे बड़ा कर्जदार है और 1958 से अब तक 26 आईएमएफ बेलआउट कार्यक्रमों के जरिए 34 अरब डॉलर के आसपास की मदद ले चुका है. तमाम रिपोर्ट्स में पाकिस्तानी इकोनॉमिस्ट बताते नजर आए हैं, कि IMF के कर्ज के सहारे चल रहा पाकिस्तान पहले से ही दिवालिया स्थिति में है और वर्तमान के बिगड़े ग्लोबल हालात इकोनॉमी को गहरी चोट पहुंचा सकते हैं।

मिडिल ईस्ट में युद्ध, PAK में कोहराम
पाकिस्तान पर दूसरा अटैक मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध से हुआ है. दरअसल, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग से तेल संकट गहरा गया है और पूरी तरह तेल के आयात पर निर्भर पाकिस्तान में कोहराम मचा है. हालात ये है कि पाकिस्तान में तेल की कमी के चलते पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए गए, सरकारी गाड़ियों में 60% कटौती, सांसदों और मंत्रियों की सैलरी कट, सरकारी विभागों के गैर-जरूरी खर्च में 20% की कटौती, मीटिंगों को वर्चुअल और पढ़ाई को ऑनलाइन में शिफ्ट करना समेत अन्य उपाय लागू किए गए हैं, जो कोरोना काल जैसे ही हैं।

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Middle East War से पाकिस्तान की बदहाल इकोनॉमी को और झटका लग सकता है. डॉन की बीते दिनों आई रिपोर्ट के मुताबिक, खुद पाकिस्तान के पूर्व वित्त मंत्री पूर्व वित्त मंत्री हाफिज पाशा ने चेतावनी दी है कि अगर ये युद्ध जारी रहा और क्रूड प्राइस 100 डॉलर के पार बने रहे, तो Pakistan GDP पर 1-1.5% का निगेटिव इम्पैक्ट पड़ सकता है. पेट्रोलियम आयात में बढ़ोतरी के चलते अगले साल पाकिस्तान को 12-14 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

उन्होंने एक और संकट की ओर इशारा करते हुए कहा कि अगर कच्चे तेल की कीमतें रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine War) के बराबर 120 डॉलर के हाई पर पहुंचती हैं, तो पाकिस्तान में महंगाई कोहराम मचा सकती है और फिर उसी दौर के करीब 30% पर पहुंच सकती है. उस समय लोग आटा, दाल के लिए अपनी जान पर खेलते नजर आए थे, तो वहीं अब फिर से फ्यूल की कमी पाकिस्तान का तेल निकालती नजर आ रही है।

पाकिस्तान में मिडिल ईस्ट की जंग के ताजा असर की बात करें, तो पाकिस्तान के ब्‍यूरो ऑफ स्‍टैटिस्टिक्‍स के साप्ताहिक महंगाई के आंकड़े के मुताबिक, बीते 11 मार्च को समाप्त सप्ताह में महंगाई सूचकांक SPI सालाना आधार पर 6.44% बढ़ गया. पेट्रोल और हाई स्पीड डीजल के दाम बढ़ने के साथ ही खाद्य पदार्थों की महंगाई दर में तेज इजाफा हुआ है. ब्रेड, दूध से लेकर आटा-दाल-चावल तक खाने-पीने की तमाम चीजों के दाम बेतहाशा बढ़े हैं।

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अफगानिस्तान से युद्ध ने बढ़ाई मुसीबत
पहले से ही बदहाल पाकिस्तान के लिए मुसीबत अफगानिस्तान के साथ चल रहे उसके युद्ध ने और भी बढ़ा दी है. हालांकि, ये संघर्ष 2025 के अंत में ही सीमा पर तनाव बढ़ने के बाद शुरू हो गया था और अब ये भीषण रूप ले चुका है. युद्ध की टेंशन में आयात और निर्यात सुस्त पड़ गया है. सीमा पर तनाव ने जरूरी सामानों की आवाजाही बाधित कर दी है, जिससे पाकिस्तान में तमाम जरूरी चीजों के दाम में तेज इजाफा हुआ है और देश के लोगों पर महंगाई की तगड़ी मार पड़ रही है।

खासतौर पर तोरखम और चमन जैसे बॉर्डर रूट्स बंद होने से ताजे सामान बंद हो गए हैं, तो वहीं पाकिस्तान में कारोबारियों की मुसीबत को अफगान कोयले की कमी ने बढ़ा दिया है. सीमेंट निर्माता कंपनियों की टेंशन भी कोयले की आपूर्ति बंद होने से चरम पर पहुंच गई है।

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